अल्बर्ट आइन्स्टीन ने कहा है- अब यह बात दुखद रूप से सिद्ध हो चुकी है कि हमारी तकनीक हमारी इंसानियत से आगे बढ़ चुकी है। आइन्स्टीन का देहांत सन 1955 में हो गया था। वे 55 साल पुराने विश्व में मौजूद तकनीकों की बात कर रहे थे। अगर आइन्स्टीन आज होते तो इंटरनेट, मोबाइल फोन, नैनो टेक्नॉलॉजी, जीनोम, हेड्रोन कोलाइडर, टेली प्रेजेन्स जैसी चीजों के बारे में क्या कहते?
विज्ञान और तकनीक की दुनिया में कोई चीज स्थायी नहीं है। वह तो एक कभी खत्म न होने वाली चढ़ाई में लगी है, जहां हर सीढ़ी के बाद आगे बढ़ने के लिए उससे अगली सीढ़ी मौजूद है। यहां एक क्रांतिकारी चीज आती है, लेकिन कुछ समय बाद वह उससे अधिक क्रांतिकारी आविष्कार या विकास के लिए रास्ता खाली कर देती है। ऐसे आविष्कार, नई तकनीकों के विकास आज भी जारी हैं और जब तक मानवीय जिज्ञासा कायम है, अन्वेषण, अनुसंधान और विकास का यह अनंत सफर जारी रहेगा। आज, जब आप-हम इन बिंदुओं पर चर्चा कर रहे हैं, तब भी विश्व के विभिन्न हिस्सों में काल-विभाजक तकनीकों का सृजन और विकास किया जा रहा है। ये दुनिया की कुछ बुनियादी समस्याओं को हल करेंगी और आपके-हमारे दैनिक जीवन, कामकाज, स्वास्थ्य और जेब को भी प्रभावित करेंगी। सन 2010 में विकसित और पल्लवित कुछ तकनीकों पर नजर डालना दिलचस्प रहेगा।
इधर घटना, उधर सर्चः गुर्दे की बीमारी से ग्रस्त होकर गंभीर अवस्था में अस्पताल मेें भर्ती एक रोगी अखबार में पढ़ता है कि इंग्लैंड के किसी मेडिकल रिसर्च इन्स्टीट्यूट ने इस बीमारी का इलाज खोज निकाला है। उसके मन में उम्मीदों का समुद्र ठांठे मारने लगता है और उत्साहित होकर वह व्यक्ति किसी के लैपटॉप पर बेताबी से इंटरनेट सर्च करता है- यह जानने के लिए कि इलाज की वह नई पद्धति कब तक बाजार में आएगी। क्या वह समय रहते इसका उपयोग कर पाएगा? उसके लिए इस समय यही एक प्रश्न सबसे महत्वपूर्ण है। लेकिन अफसोस, इंटरनेट सर्च इंजन पर अभी इस बारे में बस वही छोटी सी खबर उपलब्ध है, जो अखबार में छपी है। क्योंकि सर्च इंजन फिलहाल कुछ दिन पहले की सामग्री तक ही पहुंच पाए हैं। आज और अभी की जानकारियां उनकी पहुंच से बाहर हैं। रोगी निराश हो जाता है। जो जानकारियां सर्च इंजन तक के पास न हों, वे कहीं और भला क्या मिलेंगी?
सर्च इंजन तकनीकों ने यूं तो पिछले कुछ वर्षों में कमाल की क्षमताएं अर्जित कर ली हैं लेकिन फिर भी कुछ मंजिलें उनकी पहुंच से दूर बनी हुई हैं। ‘रियल टाइम सर्च‘ इसी तरह की एक सीमा है जिसे पार करने में उन्हें काफी देर हो गई है। आज जो सूचनाएं हम सामान्य सर्च इंजनों पर ढूंढ पाते हैं वे कुछ वर्ष, कुछ महीने या कुछ दिन पहले डाली गई सूचनाएं हैं। ठीक इस वक्त, जब आप यह लेख पढ़ रहे हैं, क्या घटित हो रहा है और कौनसी नई जानकारियां सृजित हो रही हैं, उन तक सामान्य सर्च इंजनों की निगाह नहीं पड़ती। लेकिन कई बार ये जानकारियां बहुत महत्वपूर्ण होती हैं। जैसे किसी टेलीविजन कार्यक्रम के निर्माता को अभी तुरंत घटित हुई किसी घटना पर कार्यक्रम बनाने को कहा जाए। उसके पास महज एक घंटे का समय है, और इसी बीच उसे इस घटना पर विभिन्न कोणों से रिसर्च करना है, नई जानकारियां जुटानी हैं, दुनिया भर में लोगों की कैसी प्रतिक्रियाएं रहीं उन्हें खोजना है। इतने बड़े इंटरनेट विश्व में इस तरह की सूचनाएं, प्रतिक्रियाएं (ट्वीट्स) आदि हजारों लोगों द्वारा डाली भी जा रही हैं। मगर ये सब सूचनाएं आम सर्च इंजनों पर दो-चार दिन बाद मिल पाएंगी, और बहुत सी तो सर्च इंजनों के दायरे में आएंगी ही नहीं। वे अभी की अभी कैसे मिलें? ‘रियल टाइम सर्च‘ इसका जवाब है।
गूगल के अमित सिंघल इसी तकनीक के विकास में लगे हैं। माइक्रोसॉफ्ट के शॉन शुचर भी लगभग इसी तरह की तकनीक का विकास कर चुके हैं। दोनों की रियल टाइम सर्च सुविधा अब उपलब्ध है जो ट्विटर, सोशल नेटवर्किंग साइटों और ब्लॉगों पर ठीक इसी वक्त डाली गई सामग्री को खोजने में सक्षम हैं। ट्विटर के जमाने में सूचनाएं दो-दो पंक्तियों के अनगिनत गुच्छों में मिलती हैं। उनका समानांतर विश्लेषण करना और एक साथ प्रस्तुत कर एक बड़ा चित्र खींचना तकनीकी लिहाज से कोई आसान काम नहीं है। अलबत्ता, कुछ वर्ष पहले जिसकी सिर्फ कल्पना की जा सकती थी, वह तकनीक आज एक सच्चाई बन चुकी है। व्यस्तता बढ़ रही है, समय घटता जा रहा है। ऐसे में यूज़र्स का एक-एक मिनट कीमती है। गूगल की रियल टाइम सर्च नए युग की जरूरतों के अनुकूल है, जिसे आने वाले वर्षों में आप-हम इस्तेमाल कर लोकप्रिय बनाएंगे।



