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चाय की दुकान पर धड़कती है जिंदगी!

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  काशीनाथ सिंह ठेठ बनारसी आदमी हैं। बनारस का बतरस उनकी कथा की जान है। हाल ही में उनके उपन्यास ‘रेहन पर रग्घू’ को साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला, तो अस्सी में पप्पू की चाय की दुकान पर चर्चा छिड़ गई कि गुरु यह पुरस्कार तो काशी के अस्सी पर मिलना चाहिए था। किसी ने कहा, ‘कोई बात नहीं, काशी के अस्सी को नहीं, पर अस्सी के काशी को तो मिला है।’ काशी हिंदू विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में वर्षों अध्यापन करने वाले और साहित्य की दुनिया में काशी का नाम रोशन करने वाले प्रो. काशीनाथ सिंह के नवीनतम उपन्यास ‘रेहन पर रग्घू’ को साहित्य अकादमी पुरस्कार के लिए चुना गया है। लेकिन वह ‘काशी का अस्सी’ को अपनी सबसे महत्वपूर्ण कृति मानते हैं। खांटी बनारसी अंदाज में जीने वाले और सबसे अलग शैली में लिखने वाले प्रो. सिंह से एक भेंट : ‘रेहन पर रग्घू’ को साहित्य अकादमी पुरस्कार मिलना, क्या ‘काशी का अस्सी’ जो आप की सर्वाधिक चर्चित कृति है, की अवहेलना नहीं है? नहीं, इसे अवहेलना तो नहीं कहा जा सकता है। किंतु यह अवश्य कहूंगा कि काशी का अस्सी मेरी सबसे महत्वपूर्ण कृति है। आज मेरी जो पहचान है, उसमें काशी का अस्सी का योगदान सबसे अधिक है। मेरे ज्यादातर पाठक मानते हैं कि साहित्य अकादमी पुरस्कार तो ‘काशी का अस्सी’ को ही मिलना चाहिए था। ‘रेहन पर रग्घू’ उस कृति की तुलना में मेरी पहचान से जुड़ी किताब नहीं है। ‘काशी का अस्सी’ में आपने ग्लोबलाइजेशन और बाजारीकरण के शहर में पड़ने वाले दुष्प्रभाव को अंशतः उकेरा है, लेकिन ‘रेहन पर रग्घू’ में गांवों पर बाजारीकरण के दुष्प्रभाव को चित्रित किया है। यह आपने कैसे किया? जब मैं ‘काशी का अस्सी’ लिख रहा था, उसी वक्त मेरे जेहन में यह प्रश्न उठा था कि बाजारीकरण के ग्रामीण दुष्प्रभावों को मैं कैसे लिख सकता हूं। उसके अगले चरण के रूप में मैंने गांव का चुनाव किया। उसके बहुत सारे बिंदु मैंने अपने गांव से भी लिए। मुझे याद है बचपन में मेरे गांव को ऊसर गांव कहा जाता था। मक्का, बाजरा, जोन्हरी यही चीजें पैदा हुआ करती थीं। अब लोगों के पास खेत हैं, लेकिन उन्हें जोतने के लिए बैल और हल नहीं बल्कि ट्रैक्टर है। गांवों से बैल गायब हो गए। २१वीं सदी की शुरुआत में जब मैंने अपने गांव को देखा तो बहुत बदला दिखा। दुनिया विश्वग्राम में बदल रही है। अब हमारे गांव की लड़कियां जींस और टी-शर्ट पहनती हैं। अमेरिका यही तो चाहता है कि पूरी दुनिया के लोग एक जैसा खाएं और पहनें। वह हो रहा है, लेकिन भारत की पहचान बहुलतावादी संस्कृति सिमट रही है। क्या वजह है कि आज के दौर के लेखकों की कृतियां पाठकों को उस तरह नहीं बांधती जैसी आप की कृतियां? मेरी दृष्टि में इसका एक प्रमुख कारण यह है कि आज के दौर के अधिकतर लेखक जनसाधारण से कटे हुए हैं। वे मध्यमवर्ग, मॉल तक ही सिमट कर रह गए हैं। उनके लेखन में जीवन की धड़कन नहीं है। यह सुनी जा सकती है फुटपाथ पर, चाय की दुकान पर जहां आम लोग होते हैं। इस धड़कन को पकड़ने वाले रचनाकार इस दौर में भी हैं। मैं मानता हूं सिद्धांत सूखा और जीवन हरा होता है। जीवन को समझने के लिए अपनी लोकसंस्कृति, लोक साहित्य यानी जड़ों से जुड़ना होगा। जब आपने लेखन शुरू किया था, तब और अब के हालात में कितना परिवर्तन महसूस करते हैं? मुझे याद है १९६२ का वह दौर जब हम युवाओं का कांग्रेसी हुकूमत से मोहभंग हो गया था। हमें लगता था पंचवर्षीय योजनाओं से कुछ नहीं होने वाला। उस माहौल में भी उस दौर के लेखन की दिशा गैरराजनीतिक थी। उसी दौरान नेहरू के समानांतर लोहिया की विचारधारा आई थी। मार्क्सवादियों का नक्सलबाड़ी की ओर झुकाव बढ़ने लगा था। आज भी ६० के दशक जैसे हालात बन रहे हैं। आज के युवा में भी मोहभंग जैसी स्थिति दिख रही है। तो क्या आप मानते हैं कि बाजारीकरण दुनिया के इतिहास और मौलिक विचारों पर परमाणु बम की तरह अपना दुष्प्रभाव दिखा रहा है? बिल्कुल मानता हूं। जहां तक मैं समझ सका हूं। एक वक्त ऐसा था, जब अमेरिका और रूस दो दुनिया थे, शेष सभी देश तीसरी दुनिया का हिस्सा थे। सोवियत संघ के विघटन के बाद अब अमेरिका ही रह गया है। दूसरी और तीसरी दुनिया अब है ही नहीं। जो कुछ है अमेरिका है। वही तमाम देशों की शासन विधि तक तय कर रहा है। बाजारीकरण का मूलमंत्र ही यही है कि इतिहास का अंत और विचारों का अंत। इसका सीधा असर हमारे साहित्य पर दिख रहा है। मुझे महसूस होता है कि नई पीढ़ी के लेखकों की दृष्टि में पूंजी ही विचार है। उनके लिए व्यवसाय और विचार में कोई अंतर नहीं रह गया है। क्या आप अपनी लेखन प्रक्रिया के विषय में कुछ बताना पसंद करेंगे? मेरी सोचने की प्रक्रिया सड़क से शुरू होती है। मैं एक भुक्खड़ लेखक की भांति घूमता रहता हूं। मुझे याद है जब मैं ‘काशी का अस्सी’ लिख रहा था। अस्सी पर पप्पू की दुकान पर अड़ीबाजी के दौरान हर बात को बहुत ध्यान से सुनता था। जब मुझे अपने मतलब की बातें मिल जाती थीं, तब उन्हें कलमबंद करने के लिए मैं बेचैन हो जाता था। जब तक सारी बातें कलमबंद नहीं हो जाती थीं, तब तक मेरा दूसरे किसी काम में मन नहीं लगता था। यहां तक कि मैं कक्षा में पढ़ा रहा होता, तो भी मेरे अंतरमन में कहानी ही घूमा करती थी। आपके लेखन को किसी ने परिमार्जित किया? डा. नामवर सिंह मेरे भाई ही नहीं, गुरु भी हैं। एक बार एक कहानी में मैंने लिखा, ‘...सिगरेट बुझ गई।’ कहानी पूरी होने पर मैंने उनको पढ़ने को दी। उस वक्त मैं लोलार्क कुंड के पास रहता था। कहानी पढ़ने के बाद नामवरजी मुझसे दो सिगरेट लाने को बोले। हालांकि न तो मैं सिगरेट पीता था और न वे। फिर भी उन्होंने सिगरेट सुलगाने को कहा। उन्होंने कहा, ‘पीते नहीं हो, तो भी कोई बात नहीं, कश लेकर धुआं छोड़ते रहो।’ हम दोनों ने सिगरेट सुलगाई। पूरी सिगरेट जल गई, सिर्फ टोटे बचे। तब उन्होंने बताया कि सिगरेट नहीं, बीड़ी बुझती है। अपनी अनुभूति को शब्द दो। दूसरों के अनुभव को भी अपनी रचना में शामिल कर सकते हैं, बशर्ते जब वह अपना-सा लगने लगे।

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