साल 2011 हमको अलविदा कह रहा है जो न जाने यह कितनी अनगिनत घटनाओं को अपने में समेटे है। इस साल की कुछ अहम बीते लम्हों पर गौर करें, और सबक ले जिसने न सिर्फ भारत को एक नई दिशा दी बल्कि दुनिया की अनेक घटनाओं का गवाह भी रहा। भारत के कई राज्यों में सत्ता परिवर्तन (तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल की सत्ता में महिला नेताओं जयललिता और ममता बनर्जी का काबिज होना), 2जी घोटाले में ए. राजा, कनिमोझी समेत कई नेताओं का जेल जाना आदि समेत कई बड़ी घटनाएं इस वर्ष हुईं। अन्ना हजारे के लोकपाल अभियान को कैसे भूला जा सकता है, जिसने यह साबित किया देश में लोकतंत्र अभी जीवित है और परवान चढ़ रहा है।
दुनिया के परिप्रेक्ष्य में देखें तो चाहे वह अरब जगत में विद्रोह हो या मध्य पूर्व एशिया में सत्ता के खिलाफ उठती चिंगारी, ताश के पत्तों की तरह तानाशाहों का बिखरना हो या जापान में आए विनाशकारी भूकंप और सुनामी से मौत व तबाही, ऐसी कई प्रमुख घटनाएं हुईं, जो हर्ष और अवसाद दोनों छोड़ गया। आतंकी संगठन अलकायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन की मौत 9/11 हमले की 10वीं वर्षगांठ के सही स्मरणोत्सव के तौर पर भी एक महत्वपूर्ण घटना है।
अमेरिका और पाकिस्तान के बीच विवाद, गद्दाफी का अंत जैसी घटनाओं का भी गहरा प्रभाव रहा। यदि सीधे शब्दों में कहें तो साल 2011 राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, भौगोलिक, जनसांख्यिकी, वैज्ञानिकी, मनोरंजन से जुड़ी कई बड़ी घटनाओं के लिए याद किया जाता रहेगा। तो आइए शुरू करते हैं कुछ अहम घटनाओं की इस यात्रा को...।
अन्ना का आंदोलन
सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे वर्ष 2011 में सबसे बड़े आंदोलनकर्ता के रूप में उभरे। 74 वर्षीय इस बुजुर्ग ने यकीनन एक ऐसे आंदोलन की बुनियाद रखी, जिसने देश की सियासत को हिलाकर रख दिया। जाने-माने गांधीवादी कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने 5 अप्रैल, 2011 को भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम की शुरुआत की।
अन्ना की टीम ने देश में भ्रष्टाचार को दूर करने की खातिर मजबूत जनलोकपाल बिल लाने की मांग की। जनलोकपाल बिल के मसले पर सरकार के ढीले रवैये को देखते हुए अन्ना ने फिर से आंदोलन का मन बनाया। कई बदलते घटनाक्रमों के बीच अन्ना के आंदोलन को दबाने के लिए सरकार उन्हें तिहाड़ जेल ले गई। लेकिन तीन दिन बाद सरकार को उन्हें छोडऩे पर मजबूर होना पड़ा।
मजबूत इरादों के धनी अन्ना ने तिहाड़ जेल से ही अनशन की शुरुआत कर दी। फिर जेल से रिहा होने के बाद उनका यह अनशन दिल्ली के रामलीला मैदान में जारी रहा। अन्ना हजारे का यह अनशन 13 दिन यानी 27 अगस्त तक चला जब संसद में लोकपाल पर अध्यादेश पारित कर दिया गया। लेकिन अन्ना हजारे ने अपना अनशन अगले दिन यानी 28 अगस्त को तोड़ा।
अन्ना ने सरकार को मजबूत लोकपाल बिल संसद में पारित किए जाने की डेडलाइन शीतकालीन सत्र तक कर दी। उन्होंने कहा है कि अगर सरकार शीतकालीन सत्र में लोकपाल पर कानून नहीं बनाएगी तो वह फिर आंदोलन करेंगे। सरकार ने कुछ संशोधनों के साथ आखिरकार 22 दिसंबर को लोकपाल बिल को संसद में पेश कर ही दिया।
खूब हुए घोटाले
2011 का वर्ष यूपीए सरकार के लिए चुनौती भरा रहा जहां एक के बाद एक ताबड़तोड़ घोटाले ने उसके लिए नई मुसीबतें खड़ी कर दी। कांग्रेस को इन घोटालों पर विपक्ष ने जमकर उसकी बखिया उधेड़ी तो सरकार के लिए भी इन हमलों का जवाब देना मुश्किल साबित हुआ। सरकार की खूब किरकिरी हुई और उसे शर्मसार होना पड़ा।
सबसे बड़े घोटाले के रूप में उभरा 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला। इस घोटाले के मुख्य आरोपी पूर्व दूरसंचार मंत्री ए. राजा को 2 फरवरी को सीबीआई ने गिरफ्तार कर लिया। राजा के साथ उनके सहयोगी रहे आरके चंदौलिया और सिद्धार्थ बेहुरा को भी गिरफ्तार किया गया। सीएजी की रिपोर्ट में इस बात का खुलासा हुआ कि स्पेक्ट्रम आवंटन से सरकार को 1.76 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। 2जी की आग थमी भी नहीं थी की 18 मार्च को सरकार पर यह आरोप लगा कि 2008 में मनमोहन सिंह की सरकार को बचाने के लिए सांसदों की खरीद फरोख्त की गई थी।
दरअसल आरोप यह लगा कि भारत-अमेरिका परमाणु संधि के मसले पर विश्वास मत के दौरान सरकार को बचाने के लिए सांसदों को पैसे देकर खरीदा गया। इसके बाद घोटालों का यह सिलसिला यहीं नहीं थमा, राष्ट्रमंडल खेलों में घोटाले का मामला भी सामने आया और देश को अंतरराष्ट्रीय बिरादरी के सामने शर्मसार होना पड़ा। राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन समिति के अध्यक्ष रहे सुरेश कलमाड़ी को सीबीआई ने 25 अप्रैल को धोखाधड़ी के मामले में गिरफ्तार कर लिया। सुरेश कलमाड़ी के कांग्रेसी होने की वजह से सरकार की खूब किरकिरी हुई। इस दौरान यह आरोप लगा कि आयोजन समिति ने मनमाने ढंग से अवैध ठेके दिए जिससे 95 करोड़ की संपत्ति का नुकसान हुआ।
इस वर्ष घोटालों के सिलसिले में एक तरफ जहां कांग्रेस की भद्द पिटी, वहीं बीजेपी की भी एक घोटाले ने किरकिरी करा दी। बीजेपी को कर्नाटक में उस समय शर्मसार होना पड़ा जब भाजपा सरकार के मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा पर भ्रष्टाचार और पक्षपात का आरोप लगा। अदालत ने उनके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिया और उन्हें जेल जाना पड़ा।
अवैध खनन की आग कर्नाटक के बाद गोवा तक भी जा पहुंची और सरकार ने बॉम्बे हाईकोर्ट के सामने ये माना कि राज्य में अवैध खनन हो रहा है। इस अवैध खनन के दौरान 6000 करोड़ टन आयरन ओर निकाला गया। खनन घोटाले को लेकर कई राज्यों में नेताओं के खिलाफ कार्रवाई की गई।
यात्राओं में बीता साल
देश में इस साल एक दर्जन से अधिक सियासी व सद्भावना यात्राएं आयोजित की गईं। लालकृष्ण आडवाणी और नरेंद्र मोदी ने जहां सियासी यात्राओं को अंजाम दिया, वहीं बाबा रामदेव की भारत स्वाभिमान यात्रा और श्रीश्री रविशंकर की भ्रष्टाचार के खिलाफ यात्रा देश में जनजागरूकता व सद्भावना के लिए चलाई गई।
कुल मिलाकर अगर वर्ष 2011 को श्भारत का यात्रा वर्ष्य घोषित कर दिया जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। यात्राओं के इतिहास में एक वर्ष में इतनी यात्राएं कभी नहीं हुई होंगी।
11 अक्टूबर को आडवाणी ने भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी छठी राजनीतिक यात्रा की शुरुआत जयप्रकाश नारायण की जन्मस्थली सिताबदियारा से की। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार 9 नवंबर से अपनी छठी यात्रा ‘सेवा यात्रा’ महात्मा गांधी के सत्याग्रह की धरती चंपारण से शुरू की। योग गुरु बाबा रामदेव ने अपनी 10 हजार किलोमीटर की भारत स्वाभिमान यात्रा झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की कर्मभूमि से 20 सितंबर को शुरू की। बाबा रामदेव देश से बाहर जमा काला धन वापस लाने के अपने प्रण को बार-बार दोहरा रहे हैं। आध्यात्मिक गुरु श्रीश्री रविशंकर भ्रष्टाचार के खिलाफ 7 नवंबर से उस उत्तर प्रदेश की यात्रा शरू की जहां अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं। उन्होंने आम लोगों के साथ सत्संग कर उन्हें घूस न लेने, दहेज न लेने, भ्रष्टाचार के खिलाफ लडऩे और शिक्षा का उजियारा फैलाने की शपथ भी दिलाई। इसके अलावा राहुल गांधी, नरेंद्र मोदी, राजनाथ सिंह, कलराज मिश्रा, उमा भारती, अखिलेश यादव ने भी अलग-अलग यात्राएं की।
नए राज्यों के गठन पर रहा जोर
देश भर में नए राज्य बनाने की मांगों ने फिर जोर पकड़ा। उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने विधानसभा में राज्य विभाजन का प्रस्ताव पारित कराकर नए राज्यों की पुरानी मांगों को जिंदा कर दिया है। उन्होंने यूपी को चार हिस्सों यानी पूर्वांचल, बुंदेलखंड, अवध प्रदेश और हरित प्रदेश बनाने की वकालत की। उनका कहना रहा कि छोटे राज्य बनने से प्रशासन व्यवस्था चुस्त दुरुस्त होगी और लोगों का सर्वांगीण विकास होगा।
यूपी की मुख्य विपक्षी पार्टी समाजवादी पार्टी ने राज्य विभाजन का खुलकर विरोध किया। जबकि भाजपा और कांग्रेस ने इसे चुनावी स्टंट करार दिया। अजित सिंह की पार्टी राष्ट्रीय लोकदल ने मायावती की राज्य विभाजन के फैसले को चुनावी स्टंट कहा, पर विभाजन को जनहित में बताया। अगले साल यूपी में विधान सभा के चुनाव होने हैं।
राज्यों को तोड़कर छोटे राज्य बनाने की मांग देश भर में हमेशा उठती रही है। 2011 में आंध्रप्रदेश से अलग राज्य तेलंगाना बनाने की मांग भी काफी जोरों पर रहा। इस पर काफी सियासत भी हुई। प्रदेश की राजधानी हैदराबाद और तेलंगाना इलाके में आंदोलन प्रदर्शन निरंतर जारी रहा।
तेलंगाना राज्य की मांग को लेकर कई लोगों ने आत्मदाह तक किए। स्कूल-कॉलेज के छात्रों और तेलंगाना समर्थकों ने नए राज्य के गठन के लिए प्रदर्शनों और हड़तालों में हिस्सा लिया, जिससे आम जनजीवन बुरी तरह प्रभावित हुआ। तेलंगाना राष्ट्रीय समिति के साथ-साथ कांग्रेस और टीडीपी ने भी तेलंगाना राज्य के गठन का समर्थन किया। तेलंगाना के समर्थन में कांग्रेस सांसदों और विधायकों ने अपने पार्टी हाईकमान को इस्तीफा भी दिया।
तेलंगाना की समस्या नई नहीं है। देश की आजादी और हैदराबाद रियासत के विलय के साथ ही यह एक विकट चुनौती के रूप में प्रकट हई थी और तब से आज तक यह गुत्थी आज तक उलझती रही है तथा राजनैतिक संकट का कारण बनती रही।
राज्य के विभाजन की मांग यहीं तक सीमित नहीं है। पश्चिम बंगाल से अलग गोरखालैंड राज्य की मांग भी समय-समय पर मुखर होती रही। तेलंगाना आंदोलन के तेज होने से गोरखा लोगों ने भी गोरखालैंड की मांग को लेकर धरना-प्रदर्शन किया। राज्य में तृणमूल कांग्रेस की सरकार बनने के बाद प्रदेश की मुखिया ने गोरखा स्वायत्त परिषद बनाकर फिलहाल मामले को शांत कर दिया। इसके अलावे असम से अलग बोडोलैंड, महाराष्ट्र से अलग विदर्भ, कर्नाटक से अलग कुर्क, बिहार से अलग मिथिलांचल राज्य बनाने की मांग गाहे-बगाहे उठती रही है।
मायावती बनाम राहुल
उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव की बिसात बिछ चुकी है। माया राज को शिकस्त देने के लिए कांग्रेस ने अजित सिंह की पार्टी राष्ट्रीय लोकदल से हाथ मिला लिया। इस बीच राज्य में कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी और मुख्यमंत्री मायावती के बीच जुबानी जंग का सिलसिला तेज हो गया। दोनों के बीच आरोप-प्रत्यारोप लगाने का सिलसिला लगातार जारी रहा। मायावती की नींद कांग्रेस ने उड़ा रखी है क्योंकि केंद्र में उसकी सरकार है।
बाकी दो पार्टियों यानी समाजवादी पार्टी और बीजेपी से मायावती को बहुत ज्यादा खतरा नहीं दिख रहा। राहुल गांधी ने यूपी में अपने दौरे के जरिए मायावती को कई मोर्चे पर घेरा है और उन्हें कड़ी चुनौती दी। कुछ महीने पहले यूपी के भट्टा पारसौल घटना पर राहुल गांधी ने माया सरकार को बुरी तरह घेरा और कटघरे में ला खड़ा किया। भट्टा पारसौल हिंसा मामले में मायावती सरकार बुरी तरह घिर गई। लेकिन मायावती को सबसे बड़ी राहत उस वक्त मिली जब सुप्रीम कोर्ट ने उनके ड्रीम प्रोजेक्ट नोएडा पार्क को हरी झंडी दिखा दी। मायावती को मौका मिल गया अपने विरोधियों को जवाब देने का और उनपर हमला बोलने का।
मायावती इस पार्क के जरिए अपने दलित वोट बैंक को मजबूत करना चाहती है। राहुल और मायावती के बीच कई मुद्दों पर जुबानी जंग लगातार होते रहे जिसमें राज्य में शासन का मुद्दा सबसे ऊपर रहा। राहुल गांधी ने कई बार मायावती सरकार को भ्रष्ट बताते हुए राज्य के कानून-व्यवस्था पर ऊंगली उठाई। जिस पर मायावती ने पलटवार किया कि उत्तर प्रदेश का दौरा राहुल मौजमस्ती और गरीबों का मजाक उड़ाने के लिए करते हैं। मायावती ने कांग्रेस के हर वार को नाकाम करने के लिए राज्य को चार हिस्सों में बांटने का प्रस्ताव विधानसभा में पारित कर सबको चौंका दिया।
सीवीसी नियुक्ति पर सुप्रीम कोर्ट का झटका
केंद्र सरकार को 3 मार्च, 2011 को एक बड़े झटके का सामना करना पड़ा, जब सुप्रीम कोर्ट ने सीवीसी के तौर पर पीजे थॉमस की नियुक्ति पर सवाल खड़े किए। थॉमस को अपने पद से हटने के लिए मजबूर होना पड़ा। शीर्ष कोर्ट ने प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली उस उच्चस्तरीय समिति की भी खिंचाई की, जिसने थॉमस की नियुक्ति पर सहमति दी। 1973 बैच के पूर्व आईएएस अधिकारी पीजे थॉमस के खिलाफ केरल की एक अदालत में पामोलीन आयात घोटाले से संबंधित भ्रष्टाचार का मामला चल रहा है। इस मामले में कथित तौर पर राज्य के खजाने को दो करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान हुआ।
नोएडा भूमि अधिग्रहण पर फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने यूपी सरकार की ओर से किसानों के जमीन अधिग्रहण को लेकर एक अहम फैसला दिया। जिससे सरकार के खिलाफ आंदोलनरत किसानों को काफी राहत मिली। कोर्ट ने सात जुलाई को नोएडा एक्सटेंशन के शाहबेरी गांव में जमीन अधिग्रहण के फैसले को रद्द कर दिया। साथ ही, यूपी सरकार को किसानों की अधिग्रहित 156 हेक्टेयर जमीन को लौटाने को लेकर सवाल भी खड़े किए और इस लौटाने का आदेश दिया। 25 बिल्डरों के जरिए 11 गांवों की करीब 2000 एकड़ जमीन को अधिग्रहित किया गया। नोएडा एक्सटेंशन क्षेत्र में 2.5 लाख अपार्टमेंट बनाने की योजना के तहत यह जमीन किसानों से ली गई थी।
नरेंद्र मोदी को राहत
सुप्रीम कोर्ट के 12 सितंबर के एक अहम फैसले से गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को भारी राहत मिली। इस आदेश में कहा गया कि जकिया जाफरी की याचिका की सुनवाई निचली अदालत करेगी। जाफरी ने आरोप लगाया था कि 2002 के दंगों के दौरान अहमदाबाद के गुलबर्ग सोसायटी में उसके पति एहसान जाफरी और दर्जनों अन्य लोगों की हत्या में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने जानबूझकर निष्क्रियता बरती। कोर्ट ने एसआईटी को यह निर्देश भी दिए कि वह अपनी स्टेटस रिपोर्ट संबंधित मजिस्ट्रेट के समक्ष दाखिल करे।
गुजरात हाईकोर्ट के एक अहम फैसले से नरेंद्र मोदी की सरकार को झटका लगा। एक दिसंबर को हाईकोर्ट ने इशरतजहां और तीन अन्यस लोगों के फर्जी मुठभेड़ केस की जांच को सीबीआई को हस्तांतरित करने का आदेश दिय



